ई न्यूज पंजाब, लुधियाना रामायण ज्ञान यज्ञ के सातवें दिन की सभा में आदरणीय श्री कृष्ण जी महाराज (पिता जी) एवं पूज्य श्री रेखा जी महाराज (माँ जी) के पावन सानिंध्य में श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज सरस्वती द्वारा रचित रामायण जी का परायण किया। पूज्य पिता जी महाराज ने कहा कि जिसके पास शक्ति आती है, वह शक्ति चाहे कैसी भी हो, कीर्ति की हो या हकूमत की हो, जब ये नशे आते हैं तो तीन दोष उपजते हैं। पहला मिथ्या भाषण, दूसरा परनारी गमन और तीसरा अकारण वैर हमें इन तीनों दोषों से बचना है। महाराज ने कहा मुझे बहुतों ने कहा कि जितना आनन्द इस बार आया है, पहले कभी नही आया। मैंने कहा आनन्द तो हर बार आता है, बस हम भूल जाते हैं। दूसरा मुझे कहना है रामायण तों स्वयंम आनन्द का स्वरूप है उसको महसूस करने की ज़रूरत है। रामायण में तो आनन्द ही आनन्द समाया हुआ है। महाराज जी ने कहा है लोग पूछते हैं जब मुसीबत के दिन आने वाले हो तो क्या कोई निशानी भी होती है जिस से पता लग सके। हाँ निशानी है। जब इंसान को अपने अपनो में, अपने प्यारो में वहम होने लगता है, संशय होने लगता है, दुश्मन अपने लगने लगते हैं। तो यह बुरे दिनों की निशानी है। उन्होंने कहा सेवक तो बहुत हैं। सुख और स्वार्थ के साथी तो बहुत हैं। मगर सच्चा सेवक तो वह है, जो अपनी ज़िंदगी तो दे सकता है, मगर अपने प्यार और स्नेह की बलि नही दे सकता। जीवन में जब अंधेरी रात आ जाए, घोर दुखड़े आ जाए तो हिम्मत नहीं छोड़नी। कोई काम न भी बने तो धैर्य रखना है, आज नहीं तो कल काम अवश्य बन जायेगा। हमें आशावान रहना है। कभी आस नहीं छोड़नी। आरण्य काण्ड का परायण करते हुए पूज्य पिता जी महाराज ने कहा कि शूर्पणखा के बार बार बोलने पर रावण मारीच पास गया और रावण ने कहा मारीच को की मैं तुम्हारे पास आस ले कर आया हूँ, तुम मुझे रास्ता दिखाओगे और मेरी मदद करोगे मारीच ने कहा अगर तू मुझे दोस्त समझता है तो तेरे हित की बात करता हूँ , राम को कमजोर समझने की भूल मत कर की वो घर से निकाला गया है या जंगलो में है पर वो बहुत वीर है जिसने पिता के वचन को पूरा करने के लिए अपने प्राण तक दांव पर लगा दिए उसको कमजोर मत समझ ।। रावण तू वापिस चला जा लंका में, पर रावण नहीं माना और कहता है मैं राम को छल से जीतना चाहता हूँ । मारीच कहता है कौन है तेरा सचिव जो तुझे कुपथ पर डाल रहा है और असुरों का नाश करने का सोच रहा है।। मारीच ने विश्ववामित्र जी का उदाहरण दे कर कहा कि जब उन्होंने यज्ञ करवाना था तब हम भारी सेना ले कर गए थे और तब तक की हार अभी तक मुझे याद है और मेरे खुद के प्राण मुश्किल से बचे थे तब रावण ने मारीच को कहा में तेरा वध कर दूंगा, अगर तू मेरी मदद नहीं करेगा मारीच सुंदर मृग बन कर सीता माँ की कुटिया के पास रहने लगे जाता है महाराज जी का कहना है कि जब बुरे दिन आते हैं तब व्यक्ति किसी की नहीं सुनता राम जी और सीता माँ ने लक्ष्मण जी की छल रूपी मृग होने भी बात नही सुनी ।। होनी हो के रहेगी , घटना घट के रहेगी। राम जी जो जगत को माया में रास्ता दिखाते हैं, उजाला दिखाते हैं, आज वही राम जी माया में भटक जाते हैं। माँ भवानी की जिद पर राम जी मर्ग पकड़ने जाते हैं और मर्ग इधर उधर भागता है तब राम जी ने बाण छोड़ दिया और मारीच सामने आ जाता है और मारीच चीखता चिलाता है यह आवाज माँ भवानी सुनती है लक्ष्मण जी ने कहा राम जी को साधारण न समझो उनके अंदर बल है ना वो असली हिरण था न वो आवाज यह सब हमारे शत्रु की चाल है राम जी मेरे पास धरोहर छोड़ कर गए है उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है महाराज जी का कहना है कि अगर बुरे दिनों की पहचान करनी हो तो यह है बुरे दिनों में अपने भी पराये लगते हैं सीता माँ के बार बार आग्रह करने पर लक्ष्मण के न जाने पर क्रोध में आ जाती है और कहती है आप भाई नहीं दोषी हो और भरत मिले हुए हो इस पर लक्ष्मण रेखा खींच कर जाते है आगे राम जी मिलते है रावण पीछे से साधु के कपड़ो में आ कर छल से माँ को ले जाते है जटायु जी मिलते है रावण से लड़ते हैं ऊपर से माँ भवानी ने ऊपर से आभूषण नीचे फेंके ।। और लंका ले गया ।। और रावण कहता है कि मेरी पटरानी बन जाओ मेरी सेना गयी है राम को मारने । माँ भवानी ने कड़वे शब्द कहे लक्ष्मण जी को की आपके मन में खोट है और तू भरत से मिला हुआ है उधर राम जी के मिलने पर लक्ष्मण जी को कहा कि सीता को अकेला छोड़ कर नहीं आना चाहिए था मै तुझे अपनी धरोहर छोड़ कर आया था पर जब लक्ष्मण जी ने सब बात सुनाई इस पर राम जी कांप उठे सुन कर।। राम जी कहते हैं मेरे कर्म मेरे सामने आ रहे है पहले वनवास मिला फिर पिता का देहांत और अब सीता का हरण इस पर लक्ष्मण जी उत्साहित करते है उत्साह में ही बल है महाराज जी का कहना है हमें आशा नहीं छोड़नी चाहिए मनोबल को गिरने नहीं देना है जब दुख में होवो तब सम दुखी मिल जाये तो साथी मिल जाने पर सब कार्य आसानी से पूरे हो जाते हैं वर्ष ऋतु खत्म हो गई पर सुग्रीव जी नहीं आये । इस पर महाराज जी कहते है : लोग काम करवा कर भूल जाते हैं उनकी साख सब खत्म हो जाती है इस पर राम जी लक्ष्मण जी को सुग्रीव पास भेजते है और कहते है सुग्रीव को उनका कर्म और वचन याद करवा कर आओ पर ताकत का प्रयोग करना है पर वाणी अच्छी रखनी है वाणी में कटु शब्द का प्रयोग नहीं करना है निडर हो कर बात करनी है लक्ष्मण जी गए सुग्रीव के पास गए और उसे उस के वचन याद करवाये। उन्होंने कहा कि महाराज जी का कहना है की काम होने से पहले प्रभु को याद रखते है मनतें मांगते है । और काम होने पर हम सब भूल जाते हैं। ऐसा व्यक्ति भूमि पर भार है । सुग्रीव जी मौज मस्ती में भूल गए सब वचन भूल गए और लक्ष्मण जी के एक बाण की गूंज से डर जाते और तारा से लक्ष्मण जी से बात करने को कहते है तारा लक्ष्मण जी से बात करती है अपनी मीठी बातों से क्रोध शांत कर देती है । सुग्रीव जी भोग विलास में जीवन व्यतीत कर रहे थे इस पर लक्ष्मण जी क्रोधित हो जाते है इस पर तारा उनको शांत करती है सुग्रीव जी लक्ष्मण जी से माफी मांगते है। महाराज जी का कहना है जब चोट लगती है तब आदमी बदलता है सुग्रीव जी गुरु कृपा के बिना कितने दिन राज कर लेते अंत राम जी की शरण में आना पड़ा और गुरु कृपा हुई राघव जी ने सुग्रीव जी से कहा एक तो तुम मित्र मेरे दूसरे पराक्रमी वीर हो। तीसरे चतुर हो चौथे पंडित हो विद्वान हो 5 तुम मेरा हित जानने वाले हो 6 बड़े गंभीर हो और 7 मुझे प्रिये हो अब तुम जाओ और तुम्हारा काम जाने । पहर सुग्रीव जी सब दिशाओ में अपने सैनिक भेजते है सीता माँ को ढूंढते ढूंढते निराश हो गए अंत समुन्दर पास आ गए । मन के हारे हारे है मन के जीते जीत है सब अपनी शक्तियों का बखान करते है हनुमान जी इतने बलवान थे कि वो गुरु से आगे निकल जाते थे और उनको श्राप दिया था फिर उनको प्रेरित करते है और उनकी शक्तियों को जगाते है।
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Yashpal Sharma (Editor)