पूरे देशभर में नामी व प्रख्यात लुधियाना का दयानंद मेडिकल कालेज जहां पंजाब पाॅल्यूशन कंट्रोल बोर्ड से एयर वॉटर की कंसेंट लिए बिना सालों से चल रहा है, वहीं इसके पास कईं अन्य अहम कंसेंट भी बोर्ड से हासिल नहीं हैं।उक्त कालेज ने पीपीसीबी से कभी बायो मेडिकल वेस्ट और खतरनाक वेस्ट (Hazardous Waste) तक की कंसेंट के लिए अप्लाई नहीं किया, जो बेहद अनिवार्य है। बड़ी बात है कि दयानंद मेडिकल कालेज के स्टड़ी सिलेबस में मानव और जानवरों की डेडबाड़ी चीर फाड़ का अहम हिस्सा रहता है और इन क्लासिस में ही मेडिकल स्टूडेंटस के समक्ष डेड़बाड़ी को टेबल पर रख अहम जानकारी व प्रयोग के लिए कईं पार्टस को निकाला जाता है। लेकिन इसके बाद बची डेडबाड़ी को मेडिकल कालेज में कहां रखा जाता है, ये अपने आप में सवाल है। ये सवाल इसलिए भी बड़ा है क्यों कि इस कंसेंट बिना बायो मेडिकल वेस्ट उठाने वाली एजेंसी मेडिकेयर भी ये वेस्ट नहीं उठा सकती है। ऐसे में इस वेस्ट को डीएमसी अस्पताल की वेस्ट में ट्रांसफर कर दिया जाता है या फिर इसे खुर्दबुर्द कर दिया जाता है। ये बड़ी जांच का विषय है। नियमों के तहत मेडिकल कालेज की ये बायो मेडिकल वेस्ट डीएमसी अस्पताल में ट्रांसफर तक करना संभव नहीं है और ये नियमों की बड़ी अवहेलना है। इसके साथ साथ मेडिकल कालेज से निकलने वाली खतरनाक वेस्ट (Hazardous Waste) की कंसेंट तक हास्पिटल के पास नहीं है। इसका मतलब मेडिकल कालेज की ओर से धड़ल्ले से नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। बड़ी बात है कि लुधियाना में कईं छोटी बड़ी इंडस्ट्री ऐसी हैं, जिन्हें पीपीसीबी से ये कंसेंट न मिलने के चलते बड़ी परेशानी झेलनी पड़ती हैं और कंसेंट हासिल करने के लिए भी कईं अफसरों की जेबें गर्म करनी पड़ती हैं। इतना ही नहीं वॉटर, एयर, मेडिकल व खतरनाक वेस्ट की सांभ संभाल में कोताही बरतने पर बोर्ड की ओर से कईं इंडस्ट्री की कंसेंट रोटीन में कैंसिल की जाती है और दोबारा से सुनवाई के जरिए ये कंसेंट बहाल करवाने में लाखों रुपए रिश्वत के तौर पर कारोबारियों को बहाना पड़ता है।
इन सब के अलावा ये अहम कंसेंट भी मेडिकल कालेज के पास नहीं
वॉटर, एयर,बायो मेडिकल व हेजर्डएस वेस्ट के अलावा एक ओर अहम वेस्ट का कोई लेखा जोखा दयानंद मेडिकल कालेज में नहीं रखा जाता। ये कंसेंट का नाम है ई वेस्ट कंसेंट। इस कंसेंट के अंदर अस्पताल में लगे एसी, गिजर, लाइटस, बिजली की तारें, कंप्यूटर व बिजली की अन्य वेस्ट का लेखा जोखा रखना होता है, लेकिन ये कालेज इसे लेकर भी पूरी तरह से लापरवाह है और इस मेडिकल कालेज मैनेजमेंट की ऊपर की पहुंच होने के चलते पीपीसीबी के सभी नियम कायदे सालों से ठेंगे पर रखे जा रहे हैं। यहां तक की यहां की किचन से भी निकलने वाले म्यूनिसिपल वेस्ट को रखने में भी नियमों की पालना अनिवार्य है, जो यहां पर नहीं की जाती। इस कालेज में कई सौ किलोवाट की क्षमता वाले जनरेटर भी लगे हुए हैं, लेकिन इनकी सर्विस दौरान बदले जाने वाले तेल को कैसे रखा जाता है, इसके लिए भी कोई बुक यहां मेनटेन नहीं की जाती। जबकि ये बोर्ड की 5.1 कैटेगिरी में आता है।
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इंवायरमेंट क्लीएयरेंस को लेकर भी स्थिति साफ नहीं
बात करें ओल्ड डीएमसी यानि दयानंद मेडिकल कालेज की तो इस कालेज में पिछले छह से आठ सालों में बडे़ बदलाव देखने को मिले हैं। जहां पहले यहां पुरानी बिल्डिंगें थी, वहीं इसे तोड़फोड़ कर अब यहां पर नई बड़ी बड़ी बिल्डिंग खड़ी कर दी गई हैं। इन बिल्डिंग को बनाने का कवर एरिया 20 हजार स्कवेयर मीटर से क्रास तो नहीं हुआ, ये एक बड़ा पेच हैं। नियमों के तहत कोई भी बिल्डिंग निर्माण जिसमें अगर वे एरिया 20 हजार स्कवेयर मीटर से अधिक हो तो इसके लिए पहले इंवयरमेंट क्लीएयरेंस लेना अनिवार्य है। इन बिल्डिंगों के निर्माण में नगर निगम से कुछ नक्शे तो जरुर पास करवाए गए हैं, लेकिन इस पूरे निर्माण में इंवायरमेंट को तो कोई नुकसान नहीं पहुंचा, ये भी बड़ा जांच का विषय है।
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वहीं इस बारे में जब पीपीसीबी के मेंबर सेक्रेटरी जीएस मजीठिया से बात की गई तो उन्होंने बताया कि इस बारे में चीफ इंजीनियर राज रत्तड़ा पूरी स्थिति साफ करेंगे, ये पूरा मामला उनकी नालेज में है।
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Yashpal Sharma (Editor)