यशपाल शर्मा, लुधियाना
पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की तरफ से जहां एक ओर पर्यावरण बिगाड़ने वाली इंडस्ट्री पर इंवायरमेंट कंपनसेशन के नाम पर लाखों का जुर्माना वसूलने का ट्रेंड चर्चा में आया हुआ है, वहीं दूसरी ओर इसी बोर्ड के अफसर शहर के नामी दयानंद मेडिकल कालेज पर सालों से मेहरबान नजर आ रहे हैं। ये मेडिकल कालेज पीपीसीबी से वॉटर व एयर की कंसेंट लिए बिना ही सालों से चलाया जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि दयानंद मेडिकल कालेज पीपीसीबी की लाखों रुपए की कंसेंट फीस दबाए हुए है और पीपीसीबी के अफसर भी कार्रवाई करने की बजाय मूक बने बैठे हैं। बीते दस सालों से अधिक समय में पीपीसीबी में कईं चीफ इंजीनियर, एसई और संबंधित रीजन के एक्सईन आकर बदल गए और कईं रिटायर हो गए, लेकिन किसी ने भी अफसर ने उक्त मेडिकल कालेज से लाखों रुपए की कंसेंट फीस निकलवाने की कोशिश नहीं की। बताया जाता है कि दयानंद कालेज से साल 1992 से लेकर अब तक की कंसेंट फीस लेनी बनती है, जो की लाखों रुपए में बताई जा रही है। इतना ही नहीं दयानंद मेडिकल कालेज की बिल्डिंग को बीते छह सात सालों में तोड़कर नई बिल्डिंगें बना दी गई है और इस नई बिल्डिंग निर्माण में इंवायरमेंट क्लीयरेंस का झोल भी अभी तक पिटारे से पूरी तरह बाहर नहीं आया पाया है। बताया जाता है कि डीएमसी ने वीडीएस स्कीम के तहत इस मेडिकल कालेज की पीपीसीबी में कंसेंट फीस भरी थी, लेकिन वे रिजेक्ट कर दी गई थी। लेकिन इसके बाद न तो पीपीसीबी अफसरों ने अपनी लाखों रुपए की फीस लेने में सख्ती दिखाई और न ही डीएमसी मैनेजमेंट ये कंसेंट लेने को आगे आई। बताया जाता है कि दयानंद मेडिकल कालेज के अलावा भी कुछ अन्य मेडिकल कालेज भी ऐसे हैं, जो बिना पीपीसीबी से कंसेंट लिए चल रहे हैं।
नियमों के तहत बिना कंसेंट के नहीं चल सकते मेडिकल कालेज
बात करें पीपीसीबी के नियमों की तो कोई भी मेडिकल कालेज बिना वॉटर व एयर की कंसेंट लिए बिना नहीं चलाए जा सकते और पीपीसीबी को कंसेंट फीस की अदायगी अनिवार्य है। बताया जाता है कि मेडिकल कालेज में एक हजार से अधिक स्टूडेंट व स्टाफ की रोजाना आवाजाही होती है और इनके कैंटीन, बाथरुम, यूरिनल में पानी इस्तेमाल से निकलने वाले डिस्चार्ज को ट्रीट करने के लिए यहां एफयूलेंट ट्रीटमेंट प्लॉट व इसकी कंसेंट अनिवार्य है। नियमों के तहत कोई भी इंडस्ट्री जिसका दो करोड़ से अधिक का प्लांट व मशीनरी है या उसमें दस किलोवाट से अधिक क्षमता का जनरेटर लगा हो तो उसे वॉटर व एयर की पीपीसीबी से कंसेंट लेनी पड़ती है। हलाांकि ये मेडिकल कालेज कई सौ करोड़ में है और यहां पर जनरेटर भी कई सौं किलोवाट के लगे हुए हैं। लेकिन बोर्ड अफसरों की सेंटिंग व मोटी रिश्वत के चलते इन पर कोई सख्त एक्शन नहीं लिया गया। अगर नियमों के तहत पीपीसीबी उक्त कालेज से कंसेंट फीस लेता है तो डिपार्टमेंट को आने वाले लाखों रुपए से ये विभाग प्रॉफिटएबल बन सकता है।
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बिना कंसेंट के सीवरेज में बाइपास हो रहा डिस्चार्ज
गौर हो कि दयानंद मेडिकल कालेज पूरे पंजाब के पहले 5 मेडिकल कालेज में शुमार है और इसके बावजूद बोर्ड अफसर व डीएसमी मैनेजमेंट पर्यावरण की धज्जियां उड़ाते चले जा रहे हैं। पीपीसीबी से कंसेंट लेने से पहले उक्त कालेज को एसटीपी नियमों के तहत चलाना होगा, लेकिन मौजूदा समय में कंसेंट न होने के चलते ये डिस्चार्ज सीधे सीवर में बाईपास किया जा रहा है। इतना हीं इस मेडिकल कालेज में बनी किचन की चिमनी भी साथ लगते रेजिडेंशियल इलाके की ओर खोल स्थानीय इलाका निवासियों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बना दिया गया है। इलाका निवासियों की शिकायत के बावजूद इस पर भी कोई एक्शन नहीं लिया गया।
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जानें, नए चीफ इंजीनियर राजकुमार रत्तड़ा क्या बोले
जहां दयानंद मेडिकल कालेज लुधियाना में करीब 50 साल से अधिक समय से चल रहा है, वहीं पीपीसीबी में बतौर नए चीफ इंजीनियर कमान संभाल रहे राज रत्तड़ा ने कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं और इस संबंधी संबंधित अफसर से पूछकर अगली कार्रवाई की जाएगी। बड़ी बात है कि चीफ इंजीनियर राज रत्तड़ा लुधियाना में लंबे समय तक बतौर एसड़ीओ, एक्सईन, एसई का कार्यभार संभाल चुके हैं।
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Yashpal Sharma (Editor)