October 22, 2026 08:14:57

पंजाब यूनिवर्सिटी के पीजी सिलेबस से सिख इतिहास हटाया, हरसिमरत बादल ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री को लिखा पत्र; बोलीं- यह पंजाबियों की भावनाओं से खिलवाड़

Sep14,2026 | Enews Team | Punjab

पंजाब। पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट सिलेबस से सिख इतिहास को अनिवार्य विषय की सूची से हटाकर वैकल्पिक श्रेणी में डाल दिया गया है। इस फैसले के सामने आते ही पंजाब की राजनीति गरमा गई है। बठिंडा से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इस कदम के विरोध में केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी को पत्र लिखकर कड़ा रोष व्यक्त किया है। सांसद बादल ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि यूनिवर्सिटी का यह फैसला पूरी तरह से पंजाब विरोधी है, जिसने पंजाबियों और सिख समुदाय के मन में भारी गुस्सा और अविश्वास पैदा कर दिया है। हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत किया गया है, लेकिन हरसिमरत बादल का कहना है कि यह पंजाब की समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने की कोशिश है। उन्होंने मांग की है कि एमए इतिहास के नए सिलेबस को तुरंत रद्द कर पुराना सिलेबस बहाल किया जाए। हरसिमरत कौर बादल ने लेटर में लिखा है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने एमए इतिहास के चारों सेमेस्टर से पंजाब और सिख इतिहास से जुड़े अनिवार्य विषयों को हटाकर वैकल्पिक श्रेणी में शिफ्ट कर दिया है।

सेमेस्टर I: 15 से 17 वीं शताब्दी तक का इतिहास
PU के पुराने सिलेबस में 15वीं से 17वीं शताब्दी तक पंजाब के सिख इतिहास को प्रमुखता से पढ़ाया जाता था। इसमें गुरु नानक देव जी से गुरु गोबिंद सिंह तक दस गुरुओं का इतिहास, सिख पंथ का विकास, गुरु अर्जन देव द्वारा आदि ग्रंथ का संकलन, हरमंदिर साहिब, गुरु हरगोबिंद की मीरी-पीरी, गुरु तेग बहादुर की शहादत और 1699 में खालसा पंथ की स्थापना जैसे विषय शामिल थे। नए 2026-27 सिलेबस में यह इतिहास अलग समर्पित पेपर के रूप में नहीं रखा गया। इसकी जगह धार्मिक आंदोलनों और पंजाब की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को थीम आधारित पेपरों में शामिल किया गया है।
सेमेस्टर II: अठारहवीं शताब्दी में पंजाब
18वीं शताब्दी में पंजाब में सिख शक्ति का तेजी से विस्तार हुआ। मुगल शासन कमजोर होने के बाद पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। गुरु गोबिंद सिंह के बाद बंदा सिंह बहादुर ने मुगल सत्ता के खिलाफ संघर्ष करते हुए सरहिंद पर कब्जा किया। उनके बाद सिख विभिन्न मिसलों में संगठित हुए और पंजाब के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की। दल खालसा, गुरमता और राखी व्यवस्था ने सिख शक्ति को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दौरान अहमद शाह अब्दाली ने पंजाब पर कई आक्रमण किए, लेकिन सिखों का प्रभाव बढ़ता गया। सदी के अंतिम दौर में महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिख सत्ता के एकीकरण की नींव पड़ी।

सेमेस्टर III: उन्नीसवीं शताब्दी में पंजाब
19वीं शताब्दी में पंजाब का इतिहास सिख साम्राज्य के उत्कर्ष, पतन और ब्रिटिश शासन की स्थापना का काल रहा। महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर को केंद्र बनाकर पंजाब में एक मजबूत सिख साम्राज्य स्थापित किया। 1839 में उनकी मृत्यु के बाद राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी और सिख साम्राज्य कमजोर होता गया। 1845-46 और 1848-49 के एंग्लो-सिख युद्धों के बाद 1849 में पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया गया। इसके बाद ब्रिटिश प्रशासन, राजस्व व्यवस्था और कृषि नीतियों में बदलाव हुए। इसी दौर में सिंह सभा आंदोलन, आर्य समाज और अन्य सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने पंजाब के समाज और राजनीति को प्रभावित किया।

Sikh-History-Removed-From-Panjab-Universitys-Pg-Syllabus-Harsimrat-Badal-Writes-To-The-Union-Education-Minister-Calling-It-An-Affront-To-The-Sentiments-Of-Punjabis




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